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फ्रेंडशिप डे: हाईटेक हो गई है आज की दोस्ती

रविवार, 2 अगस्त 2009

भगवान श्रीकृष्ण और उनके दीनहीन सहपाठी सुदामा की निश्छल और समर्पित मित्रता के दौर के बाद दोस्ती ने अब हाईटेक रूप ले लिया है और मित्रता के शीशे पर वक्त का धुंधलका भी साफ नजर आने लगा है।

समाज पर विश्लेषण भरी नजर रखने वाले लोगों का मानना है कि सिकुड़ते समाज और उम्मीदों की भीड़ के बीच बढ़ते अकेलेपन में दोस्ती की अहमियत और बढ़ी है लेकिन प्रगाढ़ मित्रता अब बिरले ही दिखाई देती है।

'स्माइल फाउंडेशन' से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता संदीप नायक मानते हैं कि समय के साथ दोस्ती के मायने और तौर-तरीके बदल गए हैं। उन्होंने कहा कि वक्त के साथ चीजें बदलती हैं और दोस्ती भी इससे अछूती नहीं रही है। पिछले करीब 10 वर्षों में समाज में बहुत तेजी से बदलाव आया है। नायक कहते हैं कि अब कॉफी हाउस में अलग-अलग पीढि़यों के लोगों के मिलकर गपशप करने और खुद तथा समाज से जुड़ी बातों पर गंभीर विचार-विमर्श का दौर लगभग खत्म हो चुका है। वक्त के साथ सिनेमा हॉल का कौतूहल भी काफूर हो चुका है। अब सोशल नेटवर्किंग का जमाना है।

उन्होंने कहा कि आज के दौर में फ्रेंडशिप काफी हद तक टेक्नॉलॉजी पर आधारित हो चुकी है। लोग मोबाइल फोन के साथ-साथ ऑरकुट तथा फेसबुक समेत कई सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट पर बात करते-करते दोस्त बनते हैं और उन्हीं माध्यमों पर रिश्ते बनने बिगड़ने लगे हैं।

दुनिया के विभिन्न देशों में अगस्त के पहले रविवार को फ्रेंडशिप डे मनाया जाता है। अमेरिकी कांग्रेस ने वर्ष 1935 में अगस्त के पहले रविवार को फ्रेंडशिप डे के रूप में मनाने की घोषणा की थी। दोस्ती के नाम की गई इस परम्परा को बाद में भारत समेत अनेक अन्य देशों ने भी अपनाया और इन मुल्कों में भी अगस्त के पहले रविवार को फ्रेंडशिप डे मनाने का सिलसिला शुरू हो गया।

नायक ने कहा कि अब श्रीकृष्ण और सुदामा जैसी समर्पित मित्रता का उदाहरण बिरले ही मिलता है अब दोस्ती के लिए मर मिटने का जज्बा खत्म सा हो गया है।

दिल्ली विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र की प्रोफेसर डाक्टर अनुजा अग्रवाल का मानना है कि बिखरे हुए समाज में किसी दोस्त का साथ मिलना खुद में एक मुश्किल लेकिन बहुत जरूरी बात है। जीवन में उम्मीदों और आकांक्षाओं को पाने की कोशिश में अपनों से दूरी से पैदा हुए खालीपन को दूर करने केच्लिए सच्चे दोस्त की जरूरत पड़ती है। अनुजा ने कहा कि हमारा समाज अब कमोबेश सिर्फ परिवार आधारित बन गया है और सामाजिक ताने-बाने को मजबूत बनाए रखने के लिए मित्रता के उसूलों को बरकरार रखना जरूरी है। उन्होंने कहा कि इस लिहाज से फ्रेंडशिप डे बहुत महत्वपूर्ण हो गया है।

मौजूदा वक्त में दोस्ती के महत्व के बारे में डाक्टर अनुजा जैसी ही राय व्यक्त करते हुए नायक ने कहा कि दुनिया में हर किसी को रोटी, कपड़ा और मकान के साथ एक सच्चे मित्र की भी जरूरत है लिहाजा जाहिर है कि दोस्ती की अहमियत पहले के मुकाबले अब कहीं ज्यादा बढ़ गई है।

ऑर्कुट से मिला लापता बेटे का सुराग

शुक्रवार, 31 जुलाई 2009

नई दिल्ली ।। बेटे की जुदाई के गम में टूट चुके परिवार को सोशल नेटवर्किंग साइट ऑर्कुट ने जिंदगी की सबसे बड़ी

खुशी दी। अपने 12वीं के रिजल्ट से दुखी होकर घर छोड़ने वाले इस छात्र का सुराग पुलिस की स्पेशल सेल को इंटरनेट से लगा।
शकरपुर पुलिस कॉलोनी में रहने वाले स्पेशल सेल में तैनात सब-इंस्पेक्टर राधेश्याम का बेटा सिद्धांत (18) सफदरजंग एनक्लेव में दिल्ली पुलिस पब्लिक स्कूल में 12वीं क्लास में पढ़ता था। 22 मई की सुबह अपना रिजल्ट देखने वह लक्ष्मी नगर मार्किट के साइबर कैफे में गया। उसके 56 फीसदी मार्क्स आए थे। इसके बाद वह लापता हो गया। शकरपुर थाने में गुमशुदगी दर्ज करा दी गई, लेकिन कोई अता-पता नहीं मिला। चूंकि सिद्धांत सेलफोन नहीं रखता था, उसे लोकेट नहीं किया जा सकता था।
इसी दौरान सिद्धांत के एक दोस्त ने उसकी ईमेल आईडी की उसकी फैमिली को दी। स्पेशल सेल ने छानबीन की तो पता चला कि गुमशुदगी के दिन ही सिद्धांत ने पलवल (फरीदाबाद) में साइबर कैफे पर अपना ईमेल अकाउंट चेक किया था। पुलिस उस साइबर कैफे में गई, लेकिन बात आगे नहीं बढ़ सकी। दिन बीत रहे थे और उसके माता-पिता व दो बहनों की चिंता भी बढ़ रही थी।

इसी बीच उसी कॉलोनी के एक लड़के को अपने ऑर्कुट अकाउंट में सिद्धांत का नाम 'रिसेंट विजिटर' में नजर आ गया। एक बार फिर स्पेशल सेल हरकत में आ गया। सिद्धांत के ऑर्कुट अकाउंट पर उसके दोस्तों ने उसे घर वापस आने के लिए बहुत सारे मेसेज किए थे।
स्पेशल सेल के एसीपी एल. एन. राव की टीम ने गूगल से जानकारी ली तो पता चला कि सिद्धांत ने अपना ऑर्कुट अकाउंट अंबाला में 'चंड़ोक साइबर कैफे' में चेक किया था। पुलिस उस साइबर कैफे पर पहुंची। उसने कैफे के रजिस्टर में अपना नाम और पता फर्जी लिखा हुआ था, लेकिन वहां सीसीटीवी की रिकॉर्डिंग में वह साफ नजर आ गया। साइबर कैफे के आसपास खोजबीन करने पर शनिवार शाम सिद्धांत मिल गया। उसे समझा-बुझा कर वापस ले आया गया।
ऐसे मदद करता है साइबर दोस्त
जब भी इंटरनेट पर हम लॉग-इन करते हैं तो हमारे कंप्यूटर को एक खास आईपी एड्रेस (इंटरनेट प्रोटोकॉल एड्रेस) दिया जाता है। सुप्रीम कोर्ट के वकील और साइबर एक्सपर्ट पवन दुग्गल के मुताबिक, इस आईपी एड्रेस से कंप्यूटर की लोकेशन, देश और शहर मालूम किया जा सकता है। इसके बाद इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर (जैसे एमटीएनएल, एयरटेल, रिलायंस, वोडाफोन आदि) के जरिए पुलिस उस कंप्यूटर वाले घर, दफ्तर या साइबर कैफे का पता मालूम करती है। ऑर्कुट गूगल की साइट है। इस केस में गूगल ने कंप्यूटर का पता दिया है।